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सेवा, साधना और संस्कार के साथ
वरिष्ठ नागरिकों के लिए सुरक्षित, शांत एवं
आध्यात्मिक आश्रम जी
वानप्रस्थ धाम – जीवन के वानप्रस्थ चरण का पवित्र आश्र
वानप्रस्थ धाम एक आध्यात्मिक एवं सेवा-आधारित संस्था है,
जिसकी स्थापना इस उद्देश्य से की गई है कि जीवन के वानप्रस्थ
चरण में प्रवेश कर चुके वरिष्ठ नागरिकों को सम्मान,
सुरक्षा, आत्मिक शांति और अपनापन प्राप्त हो सके।
भारतीय संस्कृति में जीवन के चार आश्रमों में वानप्रस्थ
आश्रम को विशेष स्थान दिया गया है, जहाँ व्यक्ति
सांसारिक दायित्वों से ऊपर उठकर साधना, सेवा और आत्मचिंतन
की ओर अग्रसर होता है।आज के आधुनिक समाज में संयुक्त परिवारों का विघटन,
व्यस्त जीवनशैली और सामाजिक दूरी के कारण
अनेक वृद्धजन स्वयं को अकेला, असुरक्षित
या उपेक्षित अनुभव करते हैं।
वानप्रस्थ धाम ऐसे सभी वरिष्ठ नागरिकों के लिए
एक सुरक्षित, शांत और संस्कारयुक्त वातावरण प्रदान करता है,
जहाँ वे अपने जीवन के इस चरण को गरिमा के साथ जी सकेंवानप्रस्थ धाम केवल एक निवास स्थान नहीं है।
यह एक आध्यात्मिक परिवार है,
जहाँ प्रत्येक निवासी को परिवार के सदस्य की भाँति
सम्मान और स्नेह मिलता है।
यहाँ का वातावरण सात्त्विक, अनुशासित और पूर्णतः
आध्यात्मिक है, जो मन, बुद्धि और आत्मा
तीनों को संतुलन प्रदान करता है। वानप्रस्थ धाम का उद्देश्य किसी भी प्रकार का
व्यावसायिक लाभ नहीं,
बल्कि सेवा को ही सच्चा धर्म मानते हुए
वरिष्ठ नागरिकों को सम्मानजनक और शांत जीवन देना है।
यह धाम उन सभी के लिए है
जो अपने जीवन के इस चरण में
ईश्वर-स्मरण और आत्मिक उन्नति की ओर बढ़ना चाहते है
परम पूज्य चतुरनारायण पाराशर जी महाराज
परम पूज्य चतुरनारायण पाराशर जी महाराज श्रीमद् भागवत कथा, श्रीराम कथा, श्रीशिव महापुराण कथा एवं श्रीमद् देवी भागवत कथा के सरस, ओजस्वी एवं भावपूर्ण प्रवक्ता के रूप में सम्पूर्ण भारतवर्ष में श्रद्धा और सम्मान के साथ जाने जाते हैं।
महाराज श्री का जन्म मध्य प्रदेश के विदिशा जिले के ग्राम परासी (खुर्द) में सनाढ्य विप्रकुल भूषण, श्रोत्रिय विद्वान पं. धन्नालाल पाराशर जी के पावन गृह में हुआ। बाल्यकाल से ही धार्मिक संस्कार, वेद-शास्त्रों का अध्ययन और सेवा-भाव उनके जीवन का अभिन्न अंग रहे।
आपने रामानंद संस्कृत महाविद्यालय, भोपाल से आचार्य (M.A.) की उपाधि प्राप्त की तथा शास्त्रों के गहन अध्ययन एवं अध्यापन के पश्चात कथा-वाचन को अपने जीवन का माध्यम बनाया। आपकी कथाएँ केवल शास्त्रीय व्याख्या नहीं, बल्कि जीवन को सही दिशा देने वाला आध्यात्मिक अनुभव होती हैं।
अब तक महाराज श्री 439 से अधिक कथाओं के माध्यम से सम्पूर्ण भारतवर्ष में सनातन धर्म और संस्कृति के प्रचार-प्रसार का कार्य कर चुके हैं। कथाओं के माध्यम से उन्होंने समाज की वास्तविक पीड़ा, विशेष रूप से वृद्धजनों के दुःख और अकेलेपन को निकट से अनुभव किया।
इसी अनुभूति से प्रेरित होकर महाराज श्री ने सेवा को अपने जीवन का मूल संकल्प बनाया। वे निरंतर गौ-सेवा, वानर सेवा, जीव-जंतु संरक्षण, वृद्धजन सेवा तथा गरीब, असहाय एवं दिव्यांग जनों की सहायता जैसे सेवाकार्यों में संलग्न रहते हैं।
महाराज श्री के मार्गदर्शन में मिथिला कुंज आश्रम के संरक्षण से अनेक सेवा प्रकल्प संचालित हो रहे हैं, जिनमें वानप्रस्थ धाम वृद्धजनों की सेवा हेतु एक प्रमुख एवं विशिष्ट प्रकल्प है।